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अपने बच्चे को शर्मीलेपन से बचाएं

शर्मीलापन (Shyness) क्या होता है?

शर्मीलेपन का सम्बन्ध अधिकतर सामाजिक विकास से होता है. यदि कोई बच्चा या बड़ा व्यक्ति अपनी बात किसी को कह नहीं पा रहा और शर्म महसूस हो रही है तो कहा जाता है कि वह बच्चा या व्यक्ति शर्मीला है. शर्मीला होना अपने आपमें बुरी बात नहीं है लेकिन यह बच्चे के लिए सामाजिक विकास में बहुत बड़ी रुकावट होता है इसलिए माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चे का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक विकास की ओर गर्भावस्था से ही बहुत ध्यान दे क्योंकि इस समय से ही बच्चे का विकास होना शुरू होता है. यदि कोई बड़ा व्यक्ति इस स्थिति से गुज़र रहा है तो वह भी बड़ी आसानी से अपने मन से इस भाव को मिटा सकता है. लेकिन उससे पहले इसके कारण जानने की कोशिश करते हैं.

शर्म (Shyness)के कारण –

  • Low birth weight – वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च द्वारा यह बताया है कि जो बच्चे समय से पहले जन्म लेते हैं तो उनका भार कम होता है जिसकी वजह से वे बड़े होकर शर्मीले स्वभाव के बनते हैं और उनका मानसिक, सामजिक विकास देर से होता है. बच्चे के स्वास्थ्य का पहला कर्तव्य माता का होता है. यदि माता गर्भावस्था के समय अच्छा भोजन ले तो बच्चे का स्वास्थ्य अच्छा ही होगा.

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  • Genetic (Heridity) – यह बात तो हम सभी जानते हैं कि बच्चों पर अपने माता-पिता का बहुत असर होता है. बच्चों में अधिकतर गुण अपने माता-पिता से ही आते हैं. कई बार यदि माता या पिता में से कोई भी शर्मीले स्वभाव का हो, और बच्चा अपने माता-पिता के गुणों पर गया हो तो यह संभव है कि बच्चा बड़ा होकर शर्मीला ही बनेगा.

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  • माता-पिता द्वारा शर्मीला होना सीखना – जो माता-पिता स्वभाव से शर्मीले होते हैं और अधिक पढ़े-लिखे नहीं होते, वे अपने बच्चों को भी वही शिक्षा देने की कोशिश करते हैं कि “बेटा! अगर पड़ौस वाली आंटी आपको बुलाए तो आप उनके घर मत जाना. अगर वो आंटी आपको कुछ दे तो आप उनसे कुछ मत लेना, सीधा मना कर देना.” अपनों के प्रति बच्चे के मन में ऐसी भावना डालना गलत है. इससे बच्चे के मन में दूसरों के प्रति परायेपन का भाव आता है.
  • घर का नकारात्मक माहौल – यदि घर का माहौल नकारात्मक है, माता-पिता आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं या पिता हमेशा बच्चों को डांटते ही रहते हैं तो ज़ाहिर सी बात है कि बच्चे इस माहौल में डरे-डरे से रहते हैं. न तो वे अपनी बात किसी से कह पाते हैं और न कभी खुश रह पाते हैं. यदि माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे आगे जा कर शर्मीले स्वभाव के न बनें, तो उन्हें अपने घर के माहौल को सकारात्मक और मिलनसार बनाना होगा.

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  • माता-पिता का प्यार न पाना – आजकल बहुत से माता-पिता ऐसे हैं जो नौकरी करते हैं. उन्हें अपने बच्चों से न तो बात करने की फुर्सत मिलती है, न ही वे उन्हें उतना प्यार दे पाते हैं जितना उनके बच्चे उनसे उम्मीद करते हैं. कभी-कभी माता-पिता दो बच्चों में से सिर्फ एक को ही प्यारे करते हैं. यदि माता-पिता यह कहते हैं कि बच्चों की उनके प्रति जिम्मेदारियां होती हैं तो उससे भी पहले उनकी अपने बच्चों के प्रति जिम्मेदारियां होती हैं. यदि माता-पिता अपने बच्चों के प्रति अपनी सारी जिम्मेदारियां ठीक तरह से नहीं निभा पा रहे हैं तो बड़े होकर बच्चे भी अपनी जिम्मेदारियों से चूक जाते हैं. माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को इतना प्यार दें जिससे उनका बच्चा इतना मजबूत बन जाए कि दुनिया की मुसीबतों का सामना अकेले कर सके और बड़ा होकर माता-पिता की सेवा कर सके, और अपने माता-पिता को दुनिया के आदर्श माता-पिता मानें.

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  • हर बात पर रोक-टोक – कई बार ऐसा देखा गया है कि कुछ माता-पिता को बार-बार रोक-टोक करने की आदत होती है कि “बच्चे, ऐसा नहीं करो…..वैसा नहीं करो….. ये नहीं करो….. वो नहीं करो!” इससे बच्चे में हीन भावना पैदा होती है कि वो हमेशा गलत काम ही करता है. अकेले बच्चे हमेशा गुमसुम होकर बैठे रहते हैं और अपनी कोई भी बात अपने माता-पिता से नहीं कह पाते. जब बचपन में माता-पिता ही उनके साथ ऐसा व्यवहार करेंगे तो बच्चे समाज में भी पूरी तरह से विकास नहीं कर पाएंगे. बच्चे अपनी इच्छा से कुछ नहीं कर सकते तो इससे उनके विकास में बाधा आती है. एक वैज्ञानिक भी तभी कोई नई खोज करता है जब वह अपनी इच्छा से कुछ न कुछ experiments करता रहे. इसलिए माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चे को एक सीमा तक आज़ादी अवश्य दें ताकि वो भी खुल कर जी सके.

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  • Harsh Critisizm – बच्चों के जीवन का आधार घर से ही शुरू होता है. बचपन से ही उनके जीवन की नींव पक्की होनी शुरू होती है. बचपन से ही वे अपने माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों से सीखना शुरू करते हैं. बच्चे इतने मासूम होते हैं कि दूसरों को देखकर अनजाने में गलतियाँ भी सीख जाते हैं. यदि माता-पिता उन्हें हर बात पर उनकी ही गलती निकालें तो यह गलत होगा. इसका बच्चों पर बहुत गहरा असर पड़ता है. माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को प्यार देकर उनकी गलती समझाएं, न कि बात-बात पर उनकी गलतियाँ निकालें और उन्हें डांटें. प्यार तो वो है जिसे पाकर जानवर भी आपकी बात मानने लगते हैं.

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  • माता-पिता द्वारा किसी गलती की सख्त सज़ा देना – बचपन में बच्चे मासूम और अनजान होते हैं. वे बहुत सारी गलतियाँ करते हैं. उनकी गलती पर उन्हें कड़ी सज़ा देना किसी भी बात का हल नहीं है. जैसे कई माता-पिता बच्चों को पढ़ाने के लिए कुछ देर के लिए कमरे में बंद कर देते हैं.ऐसी कड़ी सज़ा देना बहुत गलत है. बचपन होता ही इसलिए है कि बच्चे को सिखाया जाए. बच्चे के पहले गुरु उसके माता-पिता ही तो होते हैं. इसलिए माता-पिता का फ़र्ज़ है कि वे बच्चे को प्यार से सिखाएं. बच्चे प्यार को कभी नहीं भूलते. जो उन्हें प्यार देता है वे उनके हो जाते हैं.

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  • बचपन में कम दोस्त – जीवन जीने के लिए दोस्तों की सबको ज़रूरत पड़ती है. कहते हैं कि जब भगवान किसी को रिश्तेदार बनाना भूल जाता है तो उसे दोस्त बनाकर भेज देता है. दोस्ती का रिश्ता सबसे ऊपर होता है जो बिना किसी interest के निभाया जाता है. अब माता-पिता तो बच्चे के साथ हर जगह नहीं जा सकते, तो उसकी कमी दोस्त पूरी करते हैं. यदि बचपन में किसी कारण किसी बच्चे के दोस्त नहीं होते या कम होते हैं तो वो स्कूल में अपनी बात किसी से नहीं कह पाता और खुद को अकेला महसूस करता है. इसी कारण वह शर्मीले स्वभाव का बन जाता है. माता-पिता को चाहिए कि बचपन में वे अपने बच्चे के दोस्त बनाने में उसकी मदद करें.

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  • Emotionally more sensitive – कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जो अक्सर अपनी माता को परेशान देखकर खुद रोने लगते हैं क्योंकि वे मन से बहुत भावुक होते हैं. यदि बच्चा बचपन से बहुत भावुक स्वभाव का है तो यह संभव है कि वो बड़ा होकर शर्मीले स्वभाव का बनेगा. यह गुण अधिकतर लड़कियों में पाया जाता है. जो बच्चे भावुक होते हैं, वे मन के सच्चे होते हैं. मन के सच्चे बच्चे अधिकतर अंतर्मुखी होते हैं अर्थात वे अपना अधिकतर समय अपने साथ ही रहना पसंद करते हैं. दूसरों से उनको कोई मतलब नहीं रहता. जब बच्चा किसी के साथ बातचीत कम करेगा तो वह अपनी बात दूसरों के सामने स्पष्ट रूप से नहीं रख पाएगा. ऐसे में माता-पिता ही बच्चे को अपना प्यार देकर उसकी मदद कर सकते हैं.

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  • माता-पिता की डांट का डर – कभी-कभी माता या पिता का स्वभाव डांटने वाला होता है. बच्चे मन के बहुत कोमल होते हैं. बचपन में अधिक मारना, अधिक डांटना या किसी को मारते हुए देखने से भी बच्चों के मन में डर बैठ जाता है. यह डर बच्चों को स्वभाव से शर्मीला बना देता है.

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  • भावात्मक शोषण – यदि कोई अन्य बच्चा आपके बच्चे का बार-बार मज़ाक उड़ाता है तो आपका बच्चा धीरे-धीरे उससे अपनी बात कहना छोड़ देगा. ऐसा तो किसी के साथ भी हो सकता है. यदि आपका कोई बार-बार मज़ाक उडाए तो आप भी उस व्यक्ति से बातचीत करना बंद कर देंगे. किन्तु बच्चे के साथ ऐसा बार-बार होने पर बच्चे के कोमल मन पर बहुत गहरा असर होता है और वो न बोलने को अपना स्वभाव बनाना शुरू कर देता है. ऐसी घटनाएँ बच्चे को भविष्य में शर्मीला बना सकती हैं.
  • अवसाद – जब कोई बच्चा या बड़ा व्यक्ति अवसाद का शिकार हो जाता है तो वह अधिकतर गुमसुम रहता है. वह न तो किसी से बात करता है और न ही किसी से मिलना पसंद करता है. अवसाद व्यक्ति को समाज से दूर कर देता है.

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  • समाज से दूर रहना – जिन बच्चों को माता-पिता घर से बाहर नहीं निकलने देते, बाहर किसी से मिलने-जुलने नहीं देते, वे समझते हैं कि बच्चे बाहर जाकर बुरी आदतें न सीख लें; ऐसे बच्चे समाज से दूर हो जाते हैं. बड़े होकर जब उन्हें समाज का सामना करना पड़ता है तो वे असहजता महसूस करते हैं. माता-पिता यह न भूलें कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. यदि बचपन से ही उसे समाज में रहना नहीं सिखाया गया तो बड़ा होकर वह समाज के साथ नहीं रह पाएगा. माता-पिता का अपने बच्चे के प्रति पहला कर्तव्य यह है कि वे हर तरीके से independently उसे इस समाज में रहना सिखाएं और अपने पैरों पर खड़े होना सिखाएं; तभी माता-पिता का फ़र्ज़ पूरा होगा.
  • आत्म-विश्वास में कमी – माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चे में आत्म-विश्वास पैदा करें कि वो जो भी काम करे बिना किसी डर के कर सके. पढ़ाई में, किसी competition में या किसी भी क्षेत्र में उसका हौंसला बनाए रखें. बच्चे को निरंतर आगे बढ़ते रहने की, मेहनत करने की प्रेरणा देते रहें. अगर बच्चे का अपने ऊपर से विश्वास उठ गया तो बच्चा कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाएगा और अपनी बात को किसी के आगे नहीं रख पाएगा. किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए आत्म-विश्वास प्रत्येक व्यक्ति के लिए बहुत ज़रुरी है.

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  • अध्यापक द्वारा कड़ी सज़ा देना – कभी-कभी ऐसा होता है कि स्कूल में अध्यापक बच्चे की गलती पर उसे कोई ऐसी कड़ी सज़ा दे देते हैं, जिससे बच्चे के मन में अध्यापक के प्रति डर बैठ जाता है. वो डर बच्चे को दिन-रात परेशान करता रहता है और बच्चा अपनी हर बात सबसे छिपाना शुरू कर देता है. एक बार एक बच्चे ने homework नहीं किया. उसने कोशिश की पर उससे नहीं हुआ. कक्षा में अध्यापक ने उसकी इतनी पिटाई की जिससे वह अपने अध्यापक से डरने लग गया और स्कूल जाने के नाम पर रोज़ सुबह तेज़ बुखार से पीड़ित होने लगा. अगर homework न करने की बात वह अपनी माता को बताता तो भी शायद उसे डांट पड़ती इसलिए वह अपनी हर बात सबसे छिपाने लगा और उसका स्वभाव शर्मीला बन गया. इस उदाहरण से हम यह समझ सकते हैं कि बच्चे को कड़ी सज़ा देना बहुत गलत है.

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  • बच्चे के साथ बुरा व्यवहार करना – यदि बचपन से ही किसी बच्चे को डरा धमका कर रखा जाए तो उस बच्चे का भविष्य अन्धकार में ही होगा. किसी कारणवश जो बच्चे अपने परिवार से दूर हो जाते हैं या जिन्हें कोई ऐसा परिवार पालता है जो उसे डरा कर रखता है तो ऐसे बच्चों का भविष्य उस चार-दीवारी में घुट कर मर जाता है और उसका शारीरिक, मानसिक, सामाजिक विकास पूरी तरह से नहीं हो पाता.
  • बच्चे पर अपनी मर्ज़ी थोपना – यदि किसी बच्चे को बचपन से ही घर के ऐसे माहौल में रखा जाए जहाँ पर सब उस पर अपनी मर्ज़ी थोपते रहें, उससे वही काम करने को देते हैं जैसा वे चाहते हैं तो ऐसे माहौल में बच्चे का सामजिक विकास खत्म हो जाता है. माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चे को सीमित मात्रा में आज़ाद रहने की अनुमति अवश्य दें ताकि बच्चे की मानसिक और सामाजिक उन्नति हो सके.

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  • स्कूल में अन्य बच्चों द्वारा धमकाना या परेशान – कई बार स्कूल में ऐसा होता है कि कुछ बड़े बच्चे मिलकर किसी नए या छोटे मासूम बच्चों को बहुत परेशान करते हैं या सबके सामने उसका ऐसा मज़ाक उड़ाते हैं जिससे बच्चों के मन में उन बड़े बच्चों के प्रति डर बैठ जाता है. यहीं से उन डरे हुए बच्चों का सामाजिक विकास धीरे-धीरे कम होना शुरू हो जाता है. उदाहरण के लिए एक छोटे बच्चे ने बड़े स्कूल में दाखिला लिया. स्कूल के पहले दिन वहाँ कुछ बच्चों ने मिलकर उसकी निक्कर उतरवा कर उसका बहुत मज़ाक उड़ाया. उस डर से वह बच्चा बड़ा होकर शर्मीले स्वभाव का बन गया.

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  • बच्चे की शारीरिक अपंगता – कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो जन्म से ही किसी शारीरिक अपंगता का शिकार हो जाते हैं जिससे उनका सामाजिक जीवन लगभग खत्म सा हो जाता है. वे न तो इस लायक होते हैं कि समाज से संपर्क स्थापित कर सकें और न ही वे ऐसा कर पाने में सक्षम होते हैं. एक छोटी सी जगह में अपने कुछ साथियों या परिवार के साथ ही उनका पूरा जीवन खत्म हो जाता है.

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  • ऐसे माता-पिता जो अपने बच्चों की रक्षा नहीं कर सकते – जो माता-पिता शारीरिक रूप से कमज़ोर होते हैं और अपने आस-पास के लोगों के अत्याचारों से अपने बच्चे की रक्षा नहीं कर सकते, ऐसे बच्चे भी बड़े होकर अपनी बात को अपने माता-पिता और समाज से कहने में शर्म महसूस करते हैं. ऐसी स्थिति अधिकतर गाँवों में आती है जहाँ एक व्यक्ति गाँवों के लोगों पर ज़ुल्म करता है. यह उन अनपढ़ माता-पिता के साथ भी होता है जो अपने बच्चे की देखभाल सही तरीके से नहीं कर सकते.
  • Verbal skills की कमी के कारण – यदि किसी बच्चे में बोलने की क्षमता पूरी तरह से develop नहीं हो पाई है तो बच्चा अपनी बात किसी एक व्यक्ति या public के सामने कहने में हिचकिचाता है. ऐसे में वो अपनी बात किसी से कह नहीं पाता या कहने में बहुत शर्म महसूस करता है. माता-पिता को बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास की ओर बचपन से ही ज़रूर ध्यान देना चाहिए ताकि उनका बच्चा भी इस संसार में सबकी तरह सिर उठाकर जी सके और अपने माता-पिता पर गर्व महसूस कर सके.

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  • बच्चे में Asperger syndrome – यह एक तरह की बीमारी है जो कुछ बच्चों में पाई जाती है. इसमें बच्चे की basic social skills बहुत समय बाद develop होती हैं, जैसे – किसी से खुल कर बात न कर पाना, किसी से बात करते समय आँखों में आँखें मिलाकर न बोल पाना, social get-together में जाना अच्छा न लगना, जल्दी से किसी को अपना दोस्त न मानना, किसी से बात करते समय बहुत nervous महसूस करना जैसे हाथों को बार-बार हिलाना या मरोडना, दूसरों के साथ coordination बनाए न रख पाना, limited range of interest, facial eexpressions, gestures and body language को समझने और express करने में कठिनाई महसूस करना.

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ये सभी कारण इस प्रकार से हैं कि जिन पर अगर माता-पिता बचपन से ध्यान दें तो बच्चे के सामाजिक विकास में कभी बाधा न आने पाए. अत: सभी माता-पिता से यह अनुरोध है कि वे अपने बच्चे के प्रति सभी कर्तव्यों की पालना करें ताकि उनका बच्चा भी बड़ा होकर अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभा पाए.

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