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सोच का प्रभाव

by Neetu Sharma


ऋषि के दो शिष्यों में एक सकारात्मक सोच तथा दूसरा नकारात्मक सोच वाला था। सकारात्मक सोच वाला हमेशा दूसरों की भलाई तथा दूसरा नकारात्मक सोच वाला बहुत क्रोधी था। एक दिन ऋषि दोनों शिष्यों को लेकर वन में परीक्षा लेने गए। एक फलदार वृक्ष के पास दोनों शिष्यों को लेकर ऋषि ठहर गए। ऋषि ने पेड़ की ओर देखा और शिष्यों से कहा की इस पेड़ को ध्यान से देखो। फिर उन्होंने पहले शिष्य से पूछा की तुम्हें क्या दिखाई देता है? सकारात्मक सोच रखने वाले शिष्य ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि ये पेड़ बहुत ही विनम्र है लोग इसको पत्थर मारते हैं फिर भी ये बिना कुछ कहे फल देता है । इसी तरह इंसान को भी होना चाहिए, कितनी भी परेशानी हो विनम्रता और त्याग की भावना नहीं छोड़नी चाहिए। इंसान को फलदार पेड़ की तरह अपना जीवन जीना चाहिए। परमार्थ में ही अपने जीवन का पालन करना चाहिए। नकारात्मक सोच वाले शिष्य ने गुस्से से कहा ये पेड़ बहुत धूर्त है, बिना पत्थर मारे ये कभी फल नहीं देता इससे फल लेने के लिए इसे मारना ही पड़ेगा। मनुष्य को अपनी आवश्यकता की चीजें दूसरों से छीन लेनी चाहिए। यदि संसार में जीना है तो पत्थर मारे बिना काम नहीं चलेगा। कुछ अभीष्ट की प्राप्ति का सबसे सरल उपाय पत्थर मारना ही है। अब उदाहरण हमारे सामने है। पेड़ दोनों शिष्यों के लिए समान है। केवल सोच का फर्क है। पेड़ किसी प्रकार का विभेद दोनों के बीच नहीं कर रहा है। लेकिन दोनों शिष्यों की सोच के कारण पेड़ की देने की उपयोगिता बदल रही है। सकारात्मक सोच हमारे जीवन पर बहुत गहरा असर डालती है। नकारात्मक सोच के व्यक्ति अच्छी चीज़ों मे भी बुराई ही ढूंढते हैं।

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